Wednesday, April 27, 2011

भूख लिखेगा,प्यास लिखेगा


आम   लिखेगा,  ख़ास लिखेगा
वक़्त सबका,इतिहास लिखेगा


रोटी,  किल्लत,    रोग-बीमारी
भूख लिखेगा,   प्यास लिखेगा


तुम्बाफेरी,              सीनाजोरी
घपला-पर्दाफाश         लिखेगा


बलात्कार, अपहरण,   फिरौती
चीरहरण,    उच्छ्वास लिखेगा


राजनीति  अब  महज  तमाशा
संसद  भी  बदहवास   लिखेगा


बिना  हिफाज़त  लोकतंत्र   को
मुर्दाघर   की    लाश    लिखेगा


भूल-चुक       सब     लेनी-देनी
बही-खाता,     विश्वास लिखेगा


दिल्ली सबकी लेकिन फिर भी
दूर लिखेगा,        पास लिखेगा

Saturday, April 23, 2011

होता है बस वक़्त सिकंदर






झूठे  सारे  पीर    पैगम्बर 
देवता-पितर,जंतर -मंतर 


चाहे कोई  कितना  कर ले 
होता है बस वक़्त सिकंदर 


खाक छानते लोग कबीले
योगी-भोगी मस्त कलंदर 


देख बहुत  हैरानी  होती 
ठाट-बाट बापू के बन्दर 


मुल्ला-पंडित चेहरा ओढ़े 
जपते राम चलाते  खंजर 


रावण हो या  राजा  राम 
नहीं मसीहा कोई  रहबर 


न  जीते, न  मरते   बनता 
जैसे हालत सांप छुछुनदर  

कौन कहेगा गज़ले पूरी




बात बात    में    खंजर -छुरी
रोज़   बड़ी  आपस   की  दुरी


इधर तो  रुखी-सुखी  आफत
उधर    पकी     रोटी    तंदूरी


श्रम  के    दावेदार  है    भूखे
मिलती नहीं उचित मजदूरी


अब  तो   कारोबार   फिरौती
घूसखोरी   में   आगे      जूरी


चापलूसों   की  चांदी  कटती
अपने  हिस्से महज मज़बूरी


भाई-चारा  नहीं  अब मिळत
समता  की  सब सोच अधूरी


शायर   है   बीमार   देश  का
कौन   कहेगा   गज़ले    पूरी

Sunday, November 21, 2010

रुबाई



मुक्कमल  शायरी  अपनी  जख्मों  की कमाई  है
जहर-सा  दर्द  पी-पी  कर उम्र  अपनी  गवाई   है
जबसे   न   पीने    की    कसम   खायी   है यारों
ग़ज़ल     मायूस     बहुत,     नाराज    रुबाई   है
 

आग हुई है कोई लड़की

जब-जब
सूखी है उफनती नदी
लगा है
रोई है कोई लड़की,

जब-जब
मटमैला हुआ है मौसम
लगा है
मायूस हुई है कोई लड़की,

जब-जब मद्धिम पड़ी है चांदनी
लगा  है
गुम हुई है कोई लड़की,

जब-जब
दरका है शीशा
लगा है ठेस खायी है कोई लड़की,

जब-जब
फनफनाई है नागफनी
लगा है
कटीले तारों से
घिरी है कोई लड़की,

जब- जब
उठा है धुआं
लगा है
आग के हवाले हुई है कोई लड़की   

रुबाई

मेरे   जैसा   जीना     सीख

रोज़ हलाहल पीना सीख,

हर   पर्वत    गल   जायेगा

अपना बहा पसीना सीख

बेटा

जिसे

छत समझ कर

उम्र भर


सर पर


बोझ की तरह ढोया


वह

छाता भी न बन सका,

Saturday, November 20, 2010

रुबाई



मेरे   जैसा    बन     के      देख
जुल्म के  आगे   तन के    देख
रुका-झुका   न   ठोकर  खा  के
तेवर    मेरे    मन    के      देख

रुबाई



सूरत   से     मूरत     लगती     है
ठगी   गई   किस्मत    लगती  है,
बिना   पता   का   बंद    लिफाफा
हर लड़की   इक   ख़त  लगती  है
 

Friday, November 19, 2010

लिखते लिखते



पीर-पराई         लिखते लिखते
ग़ज़ल -रुबाई    लिखते लिखते
अपनी     सारी      उम्र    गवाईं 
भूख    कमाई   लिखते लिखते